सोनम वांगचुक ने खत्म की भूख हड़ताल, सहयोगियों ने जूस पिलाकर तुड़वाया अनशन

लद्दाख के अधिकारों और संवैधानिक मांगों को लेकर जारी आंदोलन रहेगा जारी, स्वास्थ्य बिगड़ने पर लिया फैसला

नई दिल्ली। प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षा सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी लंबे समय से जारी भूख हड़ताल समाप्त कर दी है। स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आने और डॉक्टरों की सलाह के बाद उन्होंने अपना अनशन खत्म करने का निर्णय लिया। उनके सहयोगियों ने उन्हें जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। हालांकि, वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है और लद्दाख के लोगों के अधिकारों तथा संवैधानिक मांगों को लेकर संघर्ष आगे भी शांतिपूर्ण ढंग से जारी रहेगा।

सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनका कहना था कि लद्दाख के पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और वहां के लोगों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। साथ ही उन्होंने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण देने, स्थानीय लोगों के अधिकार सुरक्षित करने और क्षेत्र के विकास से जुड़े मुद्दों पर सरकार से सकारात्मक पहल की मांग की।

भूख हड़ताल के दौरान लगातार उपवास करने की वजह से उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य की जांच की और लगातार निगरानी रखी। चिकित्सकों ने उन्हें अनशन समाप्त करने की सलाह दी, क्योंकि लंबे समय तक भोजन न करने से उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता था। इसके बाद सहयोगियों और समर्थकों के आग्रह पर उन्होंने जूस पीकर अपना अनशन समाप्त कर दिया।

अनशन समाप्त करने के बाद सोनम वांगचुक ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात सरकार तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि लद्दाख के लोगों के भविष्य, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकारों की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी। उन्होंने देशभर से मिले समर्थन के लिए सभी लोगों का धन्यवाद भी किया।

इस दौरान बड़ी संख्या में उनके समर्थक मौजूद रहे। अनशन समाप्त होने के बाद सभी ने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। समर्थकों का कहना है कि वांगचुक ने हमेशा शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठाई हैं तथा भविष्य में भी आंदोलन इसी प्रकार जारी रहेगा।

गौरतलब है कि सोनम वांगचुक देश के जाने-माने इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लद्दाख से जुड़े मुद्दों को लेकर वे लगातार आवाज उठाते रहे हैं। उनका मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक और कानूनी प्रावधान आवश्यक हैं।

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