450 करोड़ की सरकारी संपत्ति पर फर्जीवाड़े का खेल ध्वस्त, डीएम की सख्त कार्रवाई

उरई में 7.26 एकड़ नजूल भूमि के फर्जीवाड़े का खुलासा, कूटरचित दस्तावेजों से सरकारी संपत्ति हथियाने के प्रयास पर एफआईआर

संवाददाता | उरई/जालौन

सरकारी जमीन को निजी संपत्ति में बदलने के खेल पर जालौन प्रशासन ने बड़ा प्रहार किया है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय की सख्त कार्रवाई से उरई के ग्राम लहरिया में करीब 450 करोड़ रुपये कीमत की 7.26 एकड़ बेशकीमती नजूल भूमि को खुर्द-बुर्द किए जाने का प्रयास पकड़ में आया है।

प्रशासनिक जांच में फर्जी एवं कूटरचित दस्तावेजों के जरिए सरकारी जमीन पर अधिकार जताने और उसके हस्तांतरण/विक्रय के प्रयास के तथ्य सामने आने के बाद कोतवाली उरई में एफआईआर दर्ज करा दी गई है। करोड़ों की इस सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में जाने से रोकने की कार्रवाई को जिला प्रशासन की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

7.26 एकड़ नजूल भूमि का है मामला

मामला गाटा संख्या 518, रकबा 7.26 एकड़ नजूल भूमि का है। अभिलेखों की पड़ताल में सामने आया कि यह भूमि मूल रूप से नजूल संपत्ति है। 15 मार्च 1914 को इसे वार्षिक लीज रेंट जमा करने तथा आवासीय मकान स्थापित करने की शर्त के साथ 99 वर्ष के पट्टे पर दिया गया था।

पट्टे की शर्तों में कलेक्टर की अनुमति के बिना भवन में परिवर्तन करने तथा भूमि अथवा भवन का मूल उपयोग बदलने पर भी रोक थी। अभिलेखों में प्रारंभिक लीज ए.के. पसन्ना के नाम से दर्ज होने का उल्लेख है।

पुराने दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आईं कई परतें

जांच में पुराने दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान वर्ष 1918 में ए.के. पसन्ना की पुत्री एलिस पसन्ना द्वारा बी.सी.एच., पूना के पक्ष में भूमि का विक्रय किए जाने का उल्लेख मिला।

इसके बाद बी.सी.एच., पूना के अधिकृत प्रतिनिधि मिस्टर जॉन ई. नॉटन ने 23 सितंबर 1949 को मिस एडेलिन ग्रीगर के पक्ष में विक्रय किया।

जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि की लीज वर्ष 2014 में समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद भूमि पर अधिकार एवं उससे जुड़े लेन-देन को लेकर दावे किए जाते रहे।

नजूल और नगर पालिका के अभिलेखों में सेल डीड का उल्लेख नहीं

मामले में सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब जांच के दौरान संबंधित सेल डीड का कलेक्टर उरई के नजूल रजिस्टर और नगर पालिका परिषद उरई के संपत्ति रजिस्टर में कोई उल्लेख नहीं मिला।

यानी जिस जमीन के आधार पर निजी अधिकार और लेन-देन का दावा सामने आया, वह सरकारी अभिलेखों में राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज है।

डीएम ने गठित कराई त्रिसदस्यीय जांच समिति

जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए इसे महज भूमि विवाद न मानकर सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा मामला माना।

जिलाधिकारी द्वारा 06 मई 2026 एवं 27 मई 2026 के आदेशों के क्रम में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित कराई गई।

समिति ने राजस्व अभिलेखों, नजूल रजिस्टर, खतौनी, पुराने दस्तावेजों तथा अन्य संबंधित अभिलेखों की गहन पड़ताल की।

जांच समिति की रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

जांच समिति की रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार मूल आवंटी से भिन्न व्यक्तियों द्वारा वर्ष 1953 में डीड तैयार कर नजूल भूमि को आर्थिक लाभ के उद्देश्य से कूटरचित एवं फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से अवैधानिक रूप से विक्रय किए जाने की बात सामने आई।

जांच में इन दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट आदि के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है। समिति ने स्पष्ट किया कि शासकीय अभिलेखों में संबंधित भूमि राज्य सरकार की संपत्ति है।

जांच रिपोर्ट के आधार पर दर्ज कराई गई एफआईआर

प्रशासन ने कार्रवाई के लिए उद्धरण खतौनी, जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश पत्रांक 1082/25-एल.वी.ओ. दिनांक 28 जुलाई 2026, जांच आख्या दिनांक 08 जुलाई 2026 समेत अन्य संबंधित अभिलेखों को आधार बनाया।

जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद नगर पालिका परिषद उरई के अधिशासी अधिकारी रामअचल कुरील ने प्रभारी निरीक्षक, कोतवाली उरई को पत्र भेजकर संबंधित व्यक्तियों एवं संस्थाओं के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई।

वर्तमान कब्जेदार सहित संबंधित व्यक्तियों को कार्रवाई के दायरे में लिया गया

प्रकरण में वर्तमान कब्जेदार बेथनी क्रिश्चियन होम्स मिशन/बी.सी.एच. मिशन की प्रबंधक किरन के मसीह, निवासी पटेल नगर, उरई, संस्था से जुड़े अन्य व्यक्तियों तथा नजूल भूमि की खरीद-फरोख्त में शामिल बताए गए व्यक्तियों एवं संस्थाओं को कार्रवाई के दायरे में लिया गया है।

आरोप है कि फर्जी लीज डीड और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे सरकार की करोड़ों रुपये की जमीन को निजी हित में खुर्द-बुर्द करने, उसका विक्रय/हस्तांतरण करने और आर्थिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया गया।

450 करोड़ की सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में जाने से रोका

इस पूरे प्रकरण की सबसे अहम बात यह है कि करीब 450 करोड़ रुपये मूल्य की 7.26 एकड़ सरकारी नजूल भूमि को निजी हितों में जाने से पहले ही प्रशासन ने जांच के दायरे में लेकर कार्रवाई सुनिश्चित की।

यदि अभिलेखों की गंभीरता से पड़ताल न होती और समय रहते कार्रवाई न की जाती तो इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति को लेकर विवाद और जटिल हो सकता था।

जिलाधिकारी के निर्देश पर हुई जांच और उसके बाद दर्ज एफआईआर ने यह स्पष्ट किया है कि सरकारी जमीन के फर्जी दस्तावेज तैयार कर उसे निजी संपत्ति में बदलने की कोशिश किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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