अदालत को न बनाएं जंग का मैदान, पहले अपनाएं मध्यस्थता
एजेंसी
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को जंग का मैदान नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में सबसे पहले मध्यस्थता (मेडिएशन) का रास्ता अपनाया जाना चाहिए, ताकि पारिवारिक संबंधों को टूटने से बचाया जा सके।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद होने पर तुरंत आपराधिक मुकदमेबाजी की ओर बढ़ना समाधान नहीं है। इससे न केवल पारिवारिक ताना-बाना प्रभावित होता है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ बढ़ता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में संवाद और मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक मामलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर समाधान प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी व संवेदनशील बनाया जा सकता है। इससे पक्षकारों को भावनात्मक रूप से राहत मिलेगी और त्वरित समाधान संभव हो सकेगा।
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें पति-पत्नी के बीच गंभीर विवाद चल रहा था और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर कई आपराधिक आरोप लगाए थे। न्यायालय ने कहा कि कई बार छोटे विवाद बड़े कानूनी संघर्ष में बदल जाते हैं, जिससे बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा जैसे गंभीर मामलों में कानून का सहारा आवश्यक है, लेकिन जहां आपसी सहमति और बातचीत से समाधान संभव हो, वहां मुकदमेबाजी अंतिम विकल्प होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को वैवाहिक मामलों में संवेदनशील, संतुलित और समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिससे अदालतों का बोझ कम होगा और परिवारों को टूटने से बचाया जा सकेगा।